PCS अफसरों ने देखी DNA-Drone Lab, वैज्ञानिक जांच की समझी ताकत।
UP में वैज्ञानिक जांच पर जोर, PCS प्रशिक्षु अधिकारियों ने समझी फॉरेंसिक तकनीक।
डीएनए-ड्रोन लैब में PCS अफसरों की ट्रेनिंग, वैज्ञानिक साक्ष्यों से मजबूत होगी जांच व्यवस्था।
उत्तर प्रदेश में तकनीक आधारित पुलिसिंग और वैज्ञानिक साक्ष्यों के इस्तेमाल को बढ़ाने की दिशा में प्रशिक्षणाधीन अधिकारियों को आधुनिक फॉरेंसिक तकनीकों से परिचित कराया जा रहा है। इसी क्रम में प्रान्तीय सिविल सेवा (PCS) 2025 बैच के 38 प्रशिक्षणाधीन अधिकारियों ने उत्तर प्रदेश स्टेट इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेंसिक साइंस, लखनऊ का भ्रमण किया। अधिकारियों ने संस्थान की डीएनए लैब और ड्रोन लैब का अवलोकन कर अपराध की वैज्ञानिक जांच में इनके उपयोग और महत्व को समझा।
डीएनए और ड्रोन तकनीक से जांच को वैज्ञानिक आधार।
भ्रमण के दौरान प्रशिक्षु अधिकारियों को बताया गया कि आधुनिक अपराधों की जांच में वैज्ञानिक साक्ष्यों की भूमिका लगातार बढ़ रही है। डीएनए तकनीक के जरिए जैविक साक्ष्यों की जांच और पहचान में मदद मिलती है, जबकि ड्रोन तकनीक का इस्तेमाल अपराध स्थल के निरीक्षण, निगरानी और कठिन क्षेत्रों से साक्ष्य जुटाने जैसे कार्यों में उपयोगी हो सकता है। उत्तर प्रदेश सरकार भी फॉरेंसिक इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार और वैज्ञानिक साक्ष्य आधारित जांच पर जोर देती रही है।
‘कानून और विज्ञान का संगम ही फॉरेंसिक विज्ञान।’
संस्थान के संस्थापक निदेशक डॉ. जी.के. गोस्वामी ने प्रशिक्षु अधिकारियों को संबोधित करते हुए कहा कि फॉरेंसिक साइंस का उद्देश्य वैज्ञानिक तरीके से सच्चाई को कानून के सामने लाने और न्याय प्रक्रिया में सहयोग करना है। उन्होंने कहा कि फील्ड में सिविल सेवा की जिम्मेदारियां चुनौतीपूर्ण होती हैं और अधिकारियों को विषम परिस्थितियों में कार्य करने के लिए मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिए।डॉ. गोस्वामी ने कहा कि कानून और विज्ञान का संगम ही फॉरेंसिक विज्ञान है। उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के विजन के अनुरूप प्रदेश के अधिकारियों को फॉरेंसिक जांच की बारीकियों से परिचित कराने की बात कही। उन्होंने न्याय, सत्य और साक्ष्य के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि तकनीक पर बढ़ती निर्भरता के दौर में साइबर और फॉरेंसिक विज्ञान का महत्व भी बढ़ा है।

मृत्युकालिक बयान की कानूनी प्रक्रिया समझाई।
प्रशिक्षु अधिकारियों को मृत्युकालिक बयान यानी डाइंग डिक्लेरेशन से जुड़ी प्रक्रिया की भी जानकारी दी गई। डॉ. गोस्वामी ने बताया कि ऐसी परिस्थितियों में, जहां घायल व्यक्ति की स्थिति गंभीर हो और उसके बयान के बाद मृत्यु की आशंका हो, बयान को विधिक प्रक्रिया के तहत दर्ज किया जाना महत्वपूर्ण होता है। उन्होंने बयान को पीड़ित की भाषा में दर्ज करने और संभव होने पर डिजिटल रिकॉर्डिंग कराने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने यह भी बताया कि यदि पीड़ित बोलने में सक्षम नहीं है, लेकिन लिखकर अपनी बात बताने की स्थिति में है, तो परिस्थितियों के अनुसार ऐसा लिखित बयान भी महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकता है।
फॉरेंसिक इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार पर सरकार का जोर।
उत्तर प्रदेश में फॉरेंसिक साइंस के लिए संस्थागत ढांचे को मजबूत करने पर सरकार लगातार जोर दे रही है। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार प्रदेश में फॉरेंसिक साइंस लैब की संख्या बढ़ाई गई है और अपराध स्थल से वैज्ञानिक साक्ष्य जुटाने के लिए फॉरेंसिक संसाधनों का विस्तार किया जा रहा है। इस अवसर पर संस्थान के अपर निदेशक संजीव सुमन ने प्रशिक्षु अधिकारियों को संस्थान की कार्यप्रणाली और गतिविधियों की जानकारी दी। कार्यक्रम में अपर पुलिस अधीक्षक चिरंजीब मुखर्जी, अतुल यादव, पलक अनेजा, सेंथिल शिव सुब्रमण्यम, जनसंपर्क अधिकारी संतोष कुमार तिवारी और आरआई शैलेन्द्र सिंह सहित अन्य अधिकारी मौजूद रहे।



